रंज दिलदा हो चुके है, अब रंज अफज़ा न कीजिये,
सादिक़ दिल तो हमारे इस कदर अब रुसवा न|
हमारे शाम-ओ-सेहर की आरज़ू,
प्यासे निगाहों की जुस्तजू,
इस कदर हमारा पैगाम ठुकरा न दीजिये|
हुस्न-ए-जानां की इबादत करते है हम
इश्फ़ाक़ से, इश्तियाक़ से,
रूठ कर यु, ईमान की हमारी इस कदर इम्तहा न लीजिये|
अश्किया अंदाज़ क्यों बालम?
क्या कुसूर है हमारा?
इस कदर खामोश रहकर, अब और सज़ा न दीजिये|
गुज़ारिश है बस इनती के,
एक आखरी बार होठो से इन होठो को छु लीजिये,
नज़्म हमारी अबद तलक आप अमर कर दीजिये........
सरगोशियाँ गुमशुदा खयालों की
Monday, January 18, 2010
Thursday, January 7, 2010
यार नज़र नहीं आता, आलम-ए-पाएदार नज़र नहीं आता,
अब तो समां कुछ यु बना है के,
हम निगाहे बिछाये इंतज़ार में बैठे रहे,
बस दिल-ए-दिलदार नज़र नहीं आता |
दिल्लगी हमने भी खूब की है,
पर जहा को शायद साचा प्यार नज़र नहीं आता,
ये कैसा खेल खेला है खुदा ने हमारे साथ,
फैसला नज़र आता है,पर इन्साफ नज़र नहीं आता |
पूरी कायनात पेश-ए-ख़िदमत है मेहफ़िल में हमारे आज,
बस मोहोब्बत-ए यार नज़र नहीं आता,
चैन-ओ-करार नज़र नहीं आता,
दिल-ए-दिलदार नज़र नहीं आता,
बस दिल-ए-दिलदार नज़र नहीं आता ||
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