Sunday, November 8, 2009


भावना और अंधियारा

भावना अपना मूल प्रकाश
अंधियारे को समर्पित करती हैं
भावना अपना मूल प्रकाश
अंधियारे को समर्पित करती हैं,
पर अंधियारा स्वयं स्वरुप तलाशता
पर अंधियारा स्वयं स्वरुप तलाशता ,
घनघोर अँधेरी निशि में भटक जाता हैं.......
एक अजनबी


ज़िन्दगी के एक नए सफ़र पर चल दिये थे हम तन्हाई के साथ,
सोचा था सारी मुश्किलें और अड़चने उठाएंगे हम अपने ही हाथ,

पर जैसे-जैसे समय का चक्र अपनी दिशा में बढता गया,
वैसे-वैसे मुश्किलों का संघर्ष शांत जीवन से जड़ता गया,

धीरे-धीरे सैयम का बाँध टूटने लगा,
और हिम्मत का डोर भी हाथ से छुटने लगा,

न जाने तब किस ओर से ,
एक जाने पहचाने अजनबी ने अपना हाथ बढाया था,
और एक थक कर बैठ चुके राही को फिर से चलाना सिखाया था,

मुशिलोँ का रुत मोड़ कर राही के जीवन को सवारा था,
आशा की नयी किरण के रूप मुश्किलों से जीवन को उबारा था ||

Friday, November 6, 2009

दुरी

चांदनी जो कैद हुई बादलों की गिरफ्त में,
तो एक सितारा रो पड़ा आज रुखसत के बाद |

अन्धेरियों से हुई यु मुलाक़ात,
दिये बुझ गए शम्मा जलता रहा आज रुखसत के बाद |

गर्द बने आसुओं की कहार न सुना कोई,
सुनकर फिजाए रो पड़ी आज रुखसत के बाद |

एक शीश महेल में, एक सूनी महफिल में,
पुकारते रहे उनका नाम,
वो न सुने, न सुना कोई,
सुनकर एक शीशा रो पड़ा, आज रुखसत के बाद ||