एक अजनबी
ज़िन्दगी के एक नए सफ़र पर चल दिये थे हम तन्हाई के साथ,
सोचा था सारी मुश्किलें और अड़चने उठाएंगे हम अपने ही हाथ,
पर जैसे-जैसे समय का चक्र अपनी दिशा में बढता गया,
वैसे-वैसे मुश्किलों का संघर्ष शांत जीवन से जड़ता गया,
धीरे-धीरे सैयम का बाँध टूटने लगा,
और हिम्मत का डोर भी हाथ से छुटने लगा,
न जाने तब किस ओर से ,
एक जाने पहचाने अजनबी ने अपना हाथ बढाया था,
और एक थक कर बैठ चुके राही को फिर से चलाना सिखाया था,
मुशिलोँ का रुत मोड़ कर राही के जीवन को सवारा था,
आशा की नयी किरण के रूप मुश्किलों से जीवन को उबारा था ||
dedicated to a very very special person....
ReplyDelete