
पुकार
खामोशियाँ सरगोशियाँ बनकर गुनगुना रहीं है क्यूँ
शर्म आज ख़ुद सजकर यूँ मेहफ़िल सजा रहीं है क्यूँ,
देख ले ऐ खुदा तेरे जहाँ का हाल है क्या,
तख्लीफ किसिकी तमाशा बनकर दिल इंसान का आज
बेहला रही है क्यूँ........
खो गया हैं कहीं हमारा वो सपनो का जहाँ,
गुम हुआ हैं कहीं हमारा वो शान-ऐ-हिंदुस्तान,
शर्म और ज़िल्लत का बाज़ार हैं सजा कुछ ऐसा,
के ज़मीं भी आज हया से सर झुका रही हैं क्यूँ,
आसमा भी बादलोँ में छुपकर
आसूं बहा रही हैं क्यूँ......
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