रंज दिलदा हो चुके है, अब रंज अफज़ा न कीजिये,
सादिक़ दिल तो हमारे इस कदर अब रुसवा न|
हमारे शाम-ओ-सेहर की आरज़ू,
प्यासे निगाहों की जुस्तजू,
इस कदर हमारा पैगाम ठुकरा न दीजिये|
हुस्न-ए-जानां की इबादत करते है हम
इश्फ़ाक़ से, इश्तियाक़ से,
रूठ कर यु, ईमान की हमारी इस कदर इम्तहा न लीजिये|
अश्किया अंदाज़ क्यों बालम?
क्या कुसूर है हमारा?
इस कदर खामोश रहकर, अब और सज़ा न दीजिये|
गुज़ारिश है बस इनती के,
एक आखरी बार होठो से इन होठो को छु लीजिये,
नज़्म हमारी अबद तलक आप अमर कर दीजिये........
Monday, January 18, 2010
Thursday, January 7, 2010
यार नज़र नहीं आता, आलम-ए-पाएदार नज़र नहीं आता,
अब तो समां कुछ यु बना है के,
हम निगाहे बिछाये इंतज़ार में बैठे रहे,
बस दिल-ए-दिलदार नज़र नहीं आता |
दिल्लगी हमने भी खूब की है,
पर जहा को शायद साचा प्यार नज़र नहीं आता,
ये कैसा खेल खेला है खुदा ने हमारे साथ,
फैसला नज़र आता है,पर इन्साफ नज़र नहीं आता |
पूरी कायनात पेश-ए-ख़िदमत है मेहफ़िल में हमारे आज,
बस मोहोब्बत-ए यार नज़र नहीं आता,
चैन-ओ-करार नज़र नहीं आता,
दिल-ए-दिलदार नज़र नहीं आता,
बस दिल-ए-दिलदार नज़र नहीं आता ||
Saturday, December 19, 2009
एक कहानी
हर दरवाज़ा एक नयी कहानी सुनाता है,
कभी राज़ छुपता है,कभी खुशियाँ सजाता है,
ग़म के साये में कभी,
कभी तनहाइयों में,
छुपके से एक अजनबी सहारा बन जाता है ,
हर दरवाज़ा एक नयी कहानी सुनाता है|
बेचैनियों में जो हों कभी, तो बेचैनिया और बढ़ाता है,
फुरसत के लम्हों में अक्सर ,इंतज़ार का ज़रिया बन जाता है,
कभी राह दिखता है,कभी सपने सजाता है,
कभी रिश्ते बनाता है ,कभी मंजिल से मिलाता है.
हर दरवाज़े के साये में एक दूसरा दरवाज़ा नज़र आता है,
तलाश ख़त्म कभी होती नहीं ,बस वक़्त ख़त्म हो जाता है........
Sunday, December 13, 2009
एक अजनबी, एक हसीना
माशा अल्लाह !! उस अजनबी की किस्मत,
बिन मुलाकात इनती मोहब्बत |
दुआ करते हैं हम के अब टूटे ये इंतज़ार,
ऐ अजनबी न कर उन्हें अब और बेकरार,
ऐ अजनबी अब रुख से ज़रा नकाब उठा,
जहां उनकी भी अब तू रौशन कर जा,
ऐ अजनबी तेरा इंतज़ार उन्हें भी रहेगा,
ऐ अजनबी तेरा इंतज़ार हमें भी रहेगा....
बिन मुलाकात इनती मोहब्बत |
दुआ करते हैं हम के अब टूटे ये इंतज़ार,
ऐ अजनबी न कर उन्हें अब और बेकरार,
ऐ अजनबी अब रुख से ज़रा नकाब उठा,
जहां उनकी भी अब तू रौशन कर जा,
ऐ अजनबी तेरा इंतज़ार उन्हें भी रहेगा,
ऐ अजनबी तेरा इंतज़ार हमें भी रहेगा....
Sunday, November 8, 2009
एक अजनबी
ज़िन्दगी के एक नए सफ़र पर चल दिये थे हम तन्हाई के साथ,
सोचा था सारी मुश्किलें और अड़चने उठाएंगे हम अपने ही हाथ,
पर जैसे-जैसे समय का चक्र अपनी दिशा में बढता गया,
वैसे-वैसे मुश्किलों का संघर्ष शांत जीवन से जड़ता गया,
धीरे-धीरे सैयम का बाँध टूटने लगा,
और हिम्मत का डोर भी हाथ से छुटने लगा,
न जाने तब किस ओर से ,
एक जाने पहचाने अजनबी ने अपना हाथ बढाया था,
और एक थक कर बैठ चुके राही को फिर से चलाना सिखाया था,
मुशिलोँ का रुत मोड़ कर राही के जीवन को सवारा था,
आशा की नयी किरण के रूप मुश्किलों से जीवन को उबारा था ||
Friday, November 6, 2009
दुरी
चांदनी जो कैद हुई बादलों की गिरफ्त में,
तो एक सितारा रो पड़ा आज रुखसत के बाद |
अन्धेरियों से हुई यु मुलाक़ात,
दिये बुझ गए शम्मा जलता रहा आज रुखसत के बाद |
गर्द बने आसुओं की कहार न सुना कोई,
सुनकर फिजाए रो पड़ी आज रुखसत के बाद |
एक शीश महेल में, एक सूनी महफिल में,
पुकारते रहे उनका नाम,
वो न सुने, न सुना कोई,
सुनकर एक शीशा रो पड़ा, आज रुखसत के बाद ||
Sunday, September 27, 2009
आज
फिर ख्वाबों के अंजुमन में खो गए,
आसूँ हमारे आज फिर छुपकर,
पल्कों पर ही सो गए....
आज फिर जश्न का आलम है,
आज फिर शाम रंगीन है,
भरी महफिल में होकर भी,
हम आज फिर तन्हा हो गए.....
गुमशुदा यादों की तलाश में आज
फिर ख्वाबों के अंजुमन में खो गए,
आसूँ हमारे आज फिर, छुपकर
पल्कों पर ही सो गए....
Tuesday, September 22, 2009
इश्क
मखमली साँसों की आहट से आहे भरने लगें,
इश्क का खुमा कुछ यु छाया के हम ख़ुद से
बिछड़नें लगें,
हर हिजाब यु उट गया,
शर्म-ओ-हया की सरहदें यु घुल गई,
आगोश में उनके जो क़ैद हुए तो जन्नत के
दाएरे हम भूल गए,
उस बंदिश में साँस लिया तो
फ़ासलों में जीना भूल गए,
मखमली साँसों की आहट से आहे भरने लगें,
इश्क का खुमा कुछ यु छाया के हम ख़ुद से
बिछड़नें लगें.....
मखमली साँसों की आहट से आहे भरने लगें,
इश्क का खुमा कुछ यु छाया के हम ख़ुद से
बिछड़नें लगें,
हर हिजाब यु उट गया,
शर्म-ओ-हया की सरहदें यु घुल गई,
आगोश में उनके जो क़ैद हुए तो जन्नत के
दाएरे हम भूल गए,
उस बंदिश में साँस लिया तो
फ़ासलों में जीना भूल गए,
मखमली साँसों की आहट से आहे भरने लगें,
इश्क का खुमा कुछ यु छाया के हम ख़ुद से
बिछड़नें लगें.....
पहचान
पहचान
वस्ल की राहत जो मिली तो गुमशुदा खाहिशों
को ठिकाना मिल गया,
बेताहान नियामत यु बर्सी के अनसुने इबादतों
को आख़िर आशियाना मिल गया,
मंजिल से हूई यु मुलाक़ात के
शाफ़िना जन्नत का मेहसूस हुआ,
नफ़रत की हिकायतों का ज़िक्र
आज आकिर-कार महफूज़ हुआ,
लब धूंध रहे हैं लव्ज़ो के निशा,
नाज़ुक लम्हों में लव्ज़ो की ज़रूरत हैं कहाँ,
पहचान मिल गई है अब मुसाफिर न रहे,
कब्र मिली है सरज़मी में आज हम मुजाहिर न रहे...........

पुकार
खामोशियाँ सरगोशियाँ बनकर गुनगुना रहीं है क्यूँ
शर्म आज ख़ुद सजकर यूँ मेहफ़िल सजा रहीं है क्यूँ,
देख ले ऐ खुदा तेरे जहाँ का हाल है क्या,
तख्लीफ किसिकी तमाशा बनकर दिल इंसान का आज
बेहला रही है क्यूँ........
खो गया हैं कहीं हमारा वो सपनो का जहाँ,
गुम हुआ हैं कहीं हमारा वो शान-ऐ-हिंदुस्तान,
शर्म और ज़िल्लत का बाज़ार हैं सजा कुछ ऐसा,
के ज़मीं भी आज हया से सर झुका रही हैं क्यूँ,
आसमा भी बादलोँ में छुपकर
आसूं बहा रही हैं क्यूँ......
तलाश
तलाशअन्धेरियों में थक कर तरस कर नैंना उनकी
करती हैं रौशनी की तलाश,
यु तो लबो पर सजती हैं झूठी मुस्कुराहट उनके,
पर दिल में पन्पती हैं गुमशुदा
मोहब्बत की प्यास,
चीखती खामोशियों में बस्ती हैं वो यु,
के महसूस हैं उन्हें अकेली तन्हाई का एहसास,
अन्धेरियों में थक कर तरस कर नैना उनकी
करती हैं बस रोशनी की तलाश,
यु तो लबो पर सजती हैं झूटी मुस्कुराहट उनके
पर दिल में पनपती हैं गुमशुदा
मोहब्बत की प्यास.....
मोहब्बतें गुस्ताखी
मोहब्बतें गुस्ताखी
मोहब्बतें गुस्ताखी माफ़ कीजिये हुज़ूर,
दिल का नज़राना कुबूल कीजिये हुज़ूर,
बेखुदी मे हम आपको यूँ पुकारे चले जा रहे,
यादों में आपके शाम-ओ-सेहर गुजारे चले जा रहे,
अदाओ में आपके हम कुछ यू फना हो चुके हैं,
मुस्कुरहट में आपके हम कुछ यू खो चुके हैं,
गुजारिश हैं बस इतनी के...
एक आखरी एहसान हमपर कीजिये हुज़ूर,
दीवाने दिल को हमारे दिल में अपने एक बार पनाह दीजिये हुज़ूर ....
Monday, September 21, 2009
महेक

महेक
बेगानी एक महेक आजकल दूर करती हैं दो
अजनबी दिलूँ के दरमियाँ,
या महेक उठते हैं हम ख़ुद करीब
उन्हें लाने के लिए,
सवारने लगे हैं हम आजकल एक
अजनबी की खातिर,
तरसते हैं हमारे नैना, नैन उनसे मिलाने के लिए,
तरसती हैं हमारी सासें करीब उन्हें पाने के लिए,
अजनबी दिलूँ के दरमियाँ,
या महेक उठते हैं हम ख़ुद करीब
उन्हें लाने के लिए,
सवारने लगे हैं हम आजकल एक
अजनबी की खातिर,
तरसते हैं हमारे नैना, नैन उनसे मिलाने के लिए,
तरसती हैं हमारी सासें करीब उन्हें पाने के लिए,
बेगानी एक महेक आजकल दूर करती हैं दो
अजनबी दिलूँ के दरमियान,
या महक उठते हैं हम ख़ुद करीब
उन्हें लाने के लिए,
या महक उठते हैं हम ख़ुद करीब
उन्हें लाने के लिए,
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